बुधवार, 5 अगस्त 2015

उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा 2013 - एक बाईक ट्रिप बारिश में

कौन भूल सकता है उस तबाही को, जो 2013 में उत्तराखंड ने देखी थी। विनाश के उस सागर के तट पर उन दिनों मैं भी तो था। गंगा का वैसा रौद्र रुप आज तक हरिद्वार में मैंने तो इससे पहले नहीं देखा था। हर की पौङी की सीढीयां डूब रही थीं और गंगा के ठीक बीच में विराजित देवी की प्रतिमा का कोई नामोनिशान नहीं था।

तो दोस्तों, आपको ले चलता हुँ 2013 के उन्हीं विनाशकारी दिनों में मोटरसाईकिल से की गई अपनी हिमालय यात्रा पर।


यात्रा-योजना
मई 2013 की एक गर्म दोपहरी बहुत परेशान कर रही थी। गर्मी से दुखी जी चाहता था कि अभी हिमालय की किसी ठंडी वादी का ओर उङ चले। इसी दिन गंगोत्री जाना तय हुआ था। 15 जून 2013 के दिन पर मोहर लगा दी। तब मालूम ही नहीं था कि कैसा दिन चुन लिया है यात्रा के लिऐ। सच तो ये है कि अंदाजा ही नहीं था कि 20 दिन बाद मौसम ऐसी भी पलटी मार लेगा। मोटरसाईकिल से जाना तय हुआ और जैसा कि अपनी लंबी यात्राओं में मैं हमेशा करता हुँ, मुंह-अंधेरे सुबह चार बजे निकल जाना फाईनल हो गया। दोपहर होते-होते ऋषिकेश पहुँच जाते। फिर वहां से लक्ष्मण झूला और फिर मुनि की रेती होते हुऐ रात्रि-विश्राम नरेन्द्र नगर में करते। कुछ अनुभवी कह सकते हैं कि दोपहर में ऋषिकेश पहुँच जाने पर मैं नाईट-हॉल्ट के लिऐ चंबा या उससे भी आगे आराम से जा सकता था, जिससे अगले दिन का मेरा गंगोत्री का सफर कुछ कम हो जाता। लेकिन मेरे जैसे फक्कङ घुमक्कङ के लिऐ नरेन्द्र नगर में रात को रूकने का ऐसा ठिकाना मौजूद है जो इसके बाद कहीं नहीं मिलता। कमरे के रूपऐ बचाने के लिऐ मैं इस ठिकाने का यूज करता हुँ। लेकिन चूंकि इस बार यह काम नहीं आया तो इसके बारे में तफ़सील से फिर कभी बताऊंगा। यदि मैं नरेन्द्र नगर में रात को रूकता तो अगले दिन आराम से गंगोत्री पहुँच जाता। इसी तरह वापसी के सफर के लिऐ भी दो दिन की योजना बनाई थी पर वापसी में धनौल्टी, मसूरी होते हुऐ आना था। इस सफर के हमसफर थे सुँदर और कल्लू।

यात्रा-प्रस्थान
मुंड मुंडाते ही ओले पङने शुरु हो गऐ थे यानि यात्रा की शुरूआत में ही गङबङियां शुरु हो गईं। अब तक की यह मेरी पहली ऐसी यात्रा रही जब घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक दिक्कतों ने मेरा पीछा नहीं छोङा। जब भी मैं घुमने जाता हुँ तो कभी भी बारिश में सफर करना पसंद नहीं करता, मोटरसाईकिल पे तो कतई नहीं। लेकिन आज तो यात्रा की शुरुआत करने के लिऐ बाईक की पहली किक ही बुंदाबांदी में लगाई। सोचा कि हल्की सी बारिश ही तो है, कुछ देर में रुक जाऐगी। कोई बात नहीं, चलो। रोशनी के लिऐ जैसे ही स्विच ऑन किया तो दुसरी दिक्कत आ खङी हुई। बाईक की हैडलाईट काम नहीं कर रही थी। लीजिऐ, हो गया यात्रा का शुभ मुहूर्त! एक तो बारिश और उपर से ये महारानी अंधी हुई खङी हैं। अब तुझे चलाने के लिऐ आँखें क्या चमगादङ से माँग कर लाउँ? मैं बहुत खिज जाता हुँ ऐसे मौकों पर जब शिकार के वक्त कुतिया हगाई हो जाती है। खिसियाहट में ही फैसला कर लिया कि कल्लू की बाईक को पीछे करके खुद आगे हो लेता हुँ। उसी की कामचलाऊ रोशनी में चलते चलेंगें। आगे महादेव की इच्छा। जो होगा देखा जाऐगा।

चाहे परिस्थितयां कैसी भी हों, सुँदर यदि सफर में मेरे साथ हो तो सदैव मेरे ही पीछे बैठता है। इस मामले में वो कितना दृढप्रतिज्ञ है, इसका आपको भी आगे पता चलेगा। घर से निकलने के बाद हम रूके सोनीपत के पास। अब तक आसमान में बेहद हल्की-हल्की लाली आ गई थी। सोनीपत से निकल कर आऐ बहालगढ चौक पर। यहां उगते सूरज के सामने मुंह करके खङे हो जाऐं तो सामने तीस किलोमीटर होगी दिल्ली और पीछे दो सौ दस किलोमीटर दूर होगा चंडीगढ। दाऐं आठ किलोमीटर होगा सोनीपत शहर और बाऐं करीब बीस किलोमीटर दूर होगा गौरीपुल जोकि हरियाणा और उत्तर प्रदेश का बॉर्डर है। ये तो सभी जानते हैं कि यमुना हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों की सीमा भी बनाती है। ये गौरीपुल भी यमुना नदी पर ही बना है। यमुना अपनी धारा बदलती रहती है जिससे खेतों का कटाव हो जाता है। इसके कारण हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों की खूनी रंजिशों का भी बङा इतिहास रहा है। गौरीपुल से एक किलोमीटर चलने के बाद एक तिराहा आता है। यहां से दाहिनी ओर दिल्ली-यू.पी. का लोनी बॉर्डर और बाईं ओर हरिद्वार रोङ है। इस तिराहे से हम दो किलोमीटर भी नहीं चले होंगें कि मेरे पिताजी का फोन आ गया। वे दिल्ली पुलिस के अपने स्टाफ मित्रों के साथ मसूरी घुमने गये हुऐ थे और 18 जून को लौटने वाले थे पर फोन पर उन्होंने बताया कि वे आज ही लौट रहे हैं। उत्तराखंड में हो रही भयंकर बारिश की पहली सूचना उन्होंने ही हमें दी। साथ ही आदेश भी दे दिया कि खैर चाहते हो तो वापस घर लौट जाओ। उनके अनुसार वे कल ही लौटना चाहते थे पर उत्तराखंड में बारिश इतनी भंयकर हो रही थी कि बाहर सङक पर निकलने की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। अब जब वे थोङा सा मौका मिलते ही निकले हैं तो भी कार से बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा। बारिश में गाङी के वाईपर तक फेल हो चुके हैं। नदी के ओवरफ्लो के कारण जगह जगह सङक बह गई है। मैदानी इलाके में ये हाल है तो उपर पहाङों पर कैसी तबाही आई हुई होगी, ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लीजिऐ पहले घर से चलते वक्त ही बुंदाबांदी फिर बाईक की हैडलाईट खराब और अब ये हिला देने वाली सूचना। जब मैंने अपने दोनों मित्रों को ये बात बताई तो वे बोले कि अब वापस नहीं जाऐंगें। यात्रा शुरु हो चुकी है और अभी घर वापस लौटने का कोई तुक नहीं बनता। पहाङ पर भले ही न चढें पर हरिद्वार तक तो जरूर जाऐंगें। हरिद्वार तक मैदानी सपाट इलाका है, वहां तक कोई खतरा नहीं होने वाला। जब मैंने अपने पिता को यह बात बताई कि ये लोग वापसी के लिऐ नहीं मान रहे और मुझे साथ में जाना पङेगा तो दुःखी मन से उन्होंने स्वीकृति दे दी। अपने से बङे अनुभवियों की बात ना मानने के नतीजे हमें जल्द ही मिलने ही वाले थे। अपने रेनकोट पहने और चल दिऐ।
उत्तराखंड आगमन
ट्रेलर का पहला सीन दिखाई दिया रुङकी के पास सोलानी नाले पर। गर्मियों में कई बार यह सूखने को हो जाता है पर अबके तो यह किसी नदी का रूप धारण किऐ हुये था। आगे गंग नहर भी खूब उफनाई हुई थी। बङौत से ही बारिश में चल रहे थे, पंतजलि योगपीठ तक पहुँचते-पहुँचते बारिश भी काफी तेज हो गई थी। इतने परेशान कर दिऐ बारिश ने कि हरिद्वार तक पहुँचना भी दूभर हो गया। उपर से बहादराबाद के पास मेरी बाईक पंक्चर हो गई थी, उसने भी परेशान किया। लिहाजा हरिद्वार से दो किलोमीटर पहले ही ज्वालापुर के अपने पुराने ठिकानों में शरण लेने का फैसला करना पङा। हरिद्वार मेन रोड पर ज्वालापुर में एक चौराहे पर स्वामी श्रृद्धानंद की प्रतिमा लगी हुई है। इस चौराहे की एक पहचान और भी है, इसके बिल्कुल पास मारुति वालों का ऑथराईज्ड सर्विस सेंटर है। कैसे भूल सकता हुँ इस चौराहे को। इसका एक खास इतिहास है मेरे जीवन में। कभी पचास रुपऐ रोजाना में मारुति के इसी सर्विस सेंटर में मजदूरी कर चुका हुँ, जब ये बन ही रहा था।

खैर इस चौराहे से दाऐं हाथ को एक रास्ता जगदीशपुर जाता है। लेकिन हमें बाऐं हाथ को जाना था। इस रास्ते पर अवधूत आश्रम के पास फिर एक तिराहा बनता है जहां से सौ मीटर बाऐं हाथ को आमने-सामने दो धर्मशालाऐं हैं। एक है कुम्हारन धर्मशाला और दुसरी है गुर्जर धर्मशाला। मारुति वाले चौराहे से ये धर्मशालाऐं एक किलोमीटर भी नहीं पङतीं। कुम्हारन धर्मशाला का किराया है सौ रूपऐ और गुर्जर धर्मशाला का पचहतर रूपऐ। सोने के लिऐ चारपाई मिलती है। पचास रूपऐ के अतिरिक्त भुगतान पर डबल बेड वाला कमरा भी मिल जाता है। रुकने के लिहाज से गुर्जर धर्मशाला अच्छी है। हमने गुर्जर धर्मशाला में कमरा लिया और अपनी बाईकों को भी कमरे में ही खङा कर लिया। थके हुऐ थे, पङ कर सो गऐ।

तीन बजे के आस-पास आँख खुली। बाहर अब भी बारिश हो रही थी। कमरे में बैठे बैठे बतियाते रहे और साथ लाई नमकीन चबाते रहे। नमी में नमकीन भी पसीज गई थी। जब सात बजे तक भी बारिश नहीं रूकी तो सबने मान लिया कि अबकी बार यात्रा असफल होने वाली है। कितनी निराशा हुई थी उस दिन मुझे। अगर कमरे में ही पङा रहना था तो घर पर ही पङे रहते। इतनी दुर आने की जरुरत ही क्या थी? पर कर भी क्या सकते थे? मन मसोस कर रह गऐ। उस शाम खाना भी बाहर ढाबे से बरसात में ही लाना पङा। पूरा दिन खराब होने का अफसोस मनाते हुऐ सो गऐ। इस उम्मीद में कि कल सुबह तक मौसम खुल जाऐगा और हम आगे बढ सकेंगें। अभी तक तो इस यात्रा में कुछ अच्छा हुआ नहीं है। शायद कल मुसीबतों के बादल छँट जाऐं।
flood near roorkee
रूङकी के पास

Solani river, uttarakhand
रूङकी के पास सोलानी नाला
Gujjar Inn, Jawalapur, Haridwar
निराशा में भी नाच

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