गुरुवार, 9 जुलाई 2015

वैष्णों देवी यात्रा – कटरा से भैंरो मंदिर

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रात डेढ बजे के लगभग ट्रेन में सवार होने के बाद हम सारे सो गऐ थे। और जब सवेरे आँख खुलीं तो किला रायपुर निकल रहा था। किला रायपुर, पंजाब का यह गांव दुनियां में मशहूर है। इसकी मशहूरी की ख़ास वजह है यहां सालाना होने वाला खेल महोत्सव। आम मनोरंजक खेलों से लेकर साहस भरे अनगिनत खेलों का आयोजन किया जाता है। जांबाज सिक्ख लङाकों का प्रदर्शन देखते ही बनता है। ख़ैर किला रायपुर को फिर कभी के लिऐ रख छोङते हैं और वैष्णों माई की अपनी यात्रा पर आगे बढते हैं। जागने के बाद पहला बङा स्टेशन आया- लुधियाना। यह शहर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लुधियाना उत्तर रेलवे का बहुत बङा जंक्शन है। यहां से एक लाईन चंडीगढ की ओर जाती है। एक लाईन जाती है हरियाणा के जाखल की ओर, जिससे हम आऐ हैं। फाज़िल्का और अटारी के लिऐ भी यहां से रेलवे लाईन जाती हैं। ये लाईनें भारत-पाकिस्तान बॉर्डर की ओर जाती हैं। अटारी तो आप जानते ही होंगें। अटारी वाली लाईन वाघा होते हुऐ सीमा पार करके आगे पाकिस्तान में लाहौर तक भी जाती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी लाईन पर वर्ष 2000 के दशक में समझौता एक्सप्रेस चलाई थी। लुधियाना से ही एक सिंगल ट्रेक पंजाब के एक और शहर लोहिया खास की ओर जाता है।
लुधियाना जंक्शन पर उतरकर चाय के प्याले बनवाऐ गऐ। चाय के साथ-साथ बिस्कुट भक्षण भी किया गया। एक बात और, वर्ष 2014 में लुधियाना में ही मेरा रेलवे का पेपर था। तब रात्रि-विश्राम के लिऐ एक धर्मशाला में कमरा लिया था। किराया था मात्र सौ रुपऐ। गुसलखाना-पाखाना आदि सारी सुविधाऐं यहां उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर सौ रुपऐ में पूरी तरह पैसा वसूल जगह है। स्टेशन से बाहर निकलकर लगभग सौ मीटर बाऐं चलते हैं। एक बङा सा मॉल आता है, वहां से फिर बाईं सङक पर हो लेते हैं। यहां से सी.एम.सी. क्रिश्चियन हॉस्पीटल की ओर लगभग डेढ किलोमीटर चलना होता है। हॉस्पीटल से थोङा ही पहले एक चौक के पास यह धर्मशाला है। अगर किसी को कभी जरुरत पङे तो बेशक जा पहुँचें। एक पहचान पत्र अवश्य साथ रखें। इनका मोबाईल नंबर है- 08054248486 (यदि चालू हो तो)।

करीब पंद्रह मिनट के बाद गाङी ने रेंगना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में लुधियाना शहर को पीछे छोङते हुऐ यह द्रुतगति से अपनी मंजिल की ओर बढ चली। उतनी ही द्रुतगति से बाहर पेङ, खेत और खेतों में बने भवन पीछे की ओर भागने लगे। खेतों में बने ये भवन पंजाब राज्य की एक बङी ख़ासियत हैं। ख़ासियत क्या एक तरह से पंजाब की पहचान हैं। समतल मैदानों में जहां तक नजर जाऐ वहां तक खेत ही खेत। खेतों में बने हुऐ बङे-बङे दालानों वाले लंबे-चैङे घर। कारों, ट्रैक्टरों, यहां-वहां बिखरे कृषि कार्यों के सामानों और अन्य वैभवों से परिपूर्ण ऐसे घर शायद ही हिंदुस्तान में कहीं और देखने को मिलते हों। ऐसी संपन्नता यहां यूँ ही नहीं आ गई है। राज्य की कर्मठ प्रजा के साथ-साथ यह कमाल है एक के बाद एक उपलब्ध पानी से भरी रहने वाली नहरों और विदेशों में रहने वाले परिजनों का। गौरतलब है कि पंजाब प्रांत से बहुत ज्यादा संख्या में भारतीय विदेशों में गऐ हुऐ हैं जो अपनी कमाई का बङा हिस्सा यहां रहने वाले अपने सगे-संबंधियों को भेजते हैं। फिल्लौर-फगवाङा और जालंधर मुकेरियां होते हुऐ हम पहुँचे पठानकोट। आजादी से पहले जम्मू जाने वाली गाङियों को पठानकोट आने की आवश्यकता नहीं होती थी। बल्कि वे सियालकोट होती हुई जम्मू पहुँचती थी। विभाजन के बाद सियालकोट पाकिस्तान में चला गया और जम्मू के लिऐ पठानकोट की ओर से रेलवे लाईन बिछाई गई। ये वही सियालकोट है जिसके राजा सलवान (सुलेभान) के उपर बहुत से राग रागनियां भी बनी हुई हैं। ये रागनियां उस समय की बनी हुई हैं जब पंजाब एक संयुक्त प्रांत हुआ करता था और आज के हरियाणा-हिमाचल व पाकिस्तानी पंजाब सब इसी के हिस्से थे। सलवान को पंजाब का अंतिम राजा भी माना गया है।

पठानकोट के बाद अंडमान एक्सप्रेस का अगला स्टॉप जम्मू-कश्मीर राज्य में पङता है- कठुआ। इसके बाद सांबा और फिर जम्मू। जम्मू-कश्मीर राज्य में शेष भारत के प्री-पेड मोबाईल फोन काम नहीं करते हैं। जब हम जम्मू पहुँचे, दोपहर के ढाई बज गऐ थे। सभी के मोबाईल फोन केवल गाने बजाने और फोटु खींचने योग्य रह गऐ थे। केवल पिताश्री का एयरटेल पोस्ट-पेड मोबाईल फोन ही नेटवर्क की रेंज में था। गाङी ने लगभग सवा घंटा देर से पहुँचाऐ। अप्रैल का पहला ही सप्ताह था लेकिन गरमी बहुत ज्यादा महसुस हो रही थी। स्टेशन से निकलते ही टंपू-टैक्सी वालों ने घेर लिया- कटरा- कटरा- कटरा, चलो वैष्णों देवी, चलो माई रानी। टैक्सी वाले ही नहीं अपितु टुर ऑपरेटरों के एजेंट भी जम्मू में थोक में घुमते मिल जाऐंगें। मैं इन टुर ऑपरेटरों और टैक्सी वालों से परहेज ही रखता हुँ। अपनी यात्राऐं खुद प्लान करता हुँ और ज्यादातर सरकारी परिवहन निगम के वाहनों को ही तवज्जो देता हुँ। लिहाजा परिवारजनों को एक तरफ बिठाया और जम्मू-कश्मीर राज्य सङक परिवहन निगम के काउंटर पर बस की टिकट लेने पहुँचा गया। यह सेवा स्टेशन पर ही उपलब्ध है। आधा घंटा लगा क्योंकि भीङ ज्यादा थी पर बढिया बस की बढिया सीटें मिल गईं। यह एक मिनी बस थी जिसमें खङी सवारी का कोई प्रावधान नहीं था। जल्द ही कटरा की ओर रवाना हो लिऐ। जम्मू से कटरा के रास्ते में पहाङ तो हैं पर कुछ आकर्षण पैदा नहीं करते। एक तो इनकी उंचाई कम है उपर से ये गंजे होते जा रहे हैं। कटाई और लगातार बढते हुऐ प्रदुषण से हरियाली इस क्षेत्र में तेजी से सिमटती जा रही है। हां एक बात है इनमें कि उत्तराखंड के पहाङों की तरह अधिक ढीले नहीं हैं। वहां तो बारिश शुरु हुई नहीं कि भू-स्खलन चालू। सङक बहुत बढिया कंडीशन में है और जम्मू से कटरा पहुँचने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

टाईम पक्का याद नहीं है पर शाम होने से काफी पहले हम कटरा पहुँच गऐ थे। यहां भी वही हाय-हाय। जम्मू उतरते ही सवारी भाङे वाले पीछे पङ जाते हैं और यहां कटरा में होटलों वाले। होटल वाले भी क्या बल्कि कमीशनखोर एजेंट। आपको किसी होटल में छोङने के बाद ये वापस बस अड्डे पर आ धमकते हैं किसी नऐ ग्राहक की तलाश में। कमीशन की सेटिंग हो ही जाती है। ये एजेंट ऐसा प्रतीत कराते हैं कि होटल उनके खुद के हैं और संसार की तमाम सुविधाऐं केवल उन के यहां ही मिलेंगी। इनकी दलीलों, गुहारों पर ध्यान ना देते हुऐ हम आगे कटरा बाजार की ओर बढते रहे लेकिन एक एजेंट गले ही पङा रहा। साहब एक बार कमरा देख लीजिऐ, बिल्कुल जायज रेट ना मिले तो दोबारा नहीं कहूंगा। ठीक है भाई, चल दिखा दे। और हम उसके पीछे हो लिऐ। कुछ ही दुर चलकर एक होटल में कमरा दिखा दिया। डबल बेडरुम था। बेड के अलावा भी काफी जगह शेष थी। हमारे लिऐ सही था। बुकिंग के लिऐ रजिस्टर खुलवाया। साढे पाँच सौ रुपिये मांगे गऐ। लेकिन नौ सौ रुपिये देकर पचास घंटों के लिऐ कमरे को अपना बना लिया गया। एक अतिरिक्त दिन के लिऐ इसलिऐ कि वापस आकर आराम कर सकें और गैर-जरुरी सामान को भी यहां नीचे ही छोङ दें। परिवार साथ होने पर यही कुछ अतिरिक्त खर्चे बढते हैं। अकेला होता तो काहे का आराम और काहे का गैर-जरुरी सामान। किसी कमरे की जरुरत ही नहीं थी। पर परिवार के साथ घुमने का अलग ही मजा भी तो होता है। कमरा बुकिंग के बाद सभी बारी-बारी से नहा-धोकर फ्रैश हुऐ और खाना खाने निकल गऐ। कुछ देर आराम किया और फिर रुम लॉक करके मां वैष्णों देवी के भवन की ओर प्रस्थान कर दिया।

पैदल चढाई शुरु करने से पहले वैष्णों देवी श्राईन बोर्ड द्वारा जारी यात्रा पर्ची लेनी होनी होती है। यह आपके रजिस्ट्रेशन की तरह होती है। यात्रा पर्ची कटरा बस अड्डे के पास स्थित कार्यालय से निःशुल्क मिलती है। लाईन में लगने के झंझट से बचने के लिऐ अब यह वैष्णों देवी श्राईन बोर्ड की वेबसाइट से भी मिलने लगी है। वैष्णों देवी यात्रा पर्ची ऑनलाईन प्राप्त करने के लिऐ यहां क्लिक करें। पर्ची लेने के छह घंटों की भीतर बाणगंगा चेक पोस्ट को पार करना होता है। यह कटरा बस अड्डे से लगभग एक किलोमीटर दुर है। बाणगंगा चेक पोस्ट किसी बङे द्वार जैसा दिखता है। यहां भक्तगणों को लाईन में नियंत्रित रखने के लिऐ के लोहे की रेलिंग लगाई गई हैं। यहां से भवन की दुरी है 14 किलोमीटर। यहां यात्रा पर्ची चेक की जाती है। इससे आगे धुम्रपान और मद्यपान पर सख्त पाबंदी है। हमने चेक पोस्ट को पार किया और आगे बढ गऐ। कुछ ही देर में शेड शुरु हो गईं। लीद की भारी गंध फैली रहती है इन शेड्स में। यहां से खच्चर और पालकियां मिलती हैं जो धुर भवन तक पहुँचा देती हैं। एक आदमी का खर्च है 1200 रुपऐ। हमने इन से कोई भाव-ताव नहीं किया और आगे बढ चले। पैदल चढाई शुरु करने पर खूब बाजार सजा मिलता है। छोटी-छोटी आम जरुरत की चीजों से लेकर आधुनिक साज़ो-सामान तक यहां मिल जाऐगा। थके हुओं के लिऐ मसाज और वाइब्रेटर मशीनें तक उपलब्ध हैं। बाजार बहुत आगे उंचाई तक नहीं जाता है। इसलिऐ मसाज और वाइब्रेटर मशीनों की आवश्यकता भी नहीं पङती है। हां दर्शन करने के बाद वापसी में कुछ नाजुक-मिजाज़ भक्त इनकी सेवाऐं लेते देखे जा सकते हैं। भवन तक चढाई का रास्ता आम सेहत वालों के लिऐ भी मुश्किल नहीं है। एकदम शानदार है। बहुत सारी सीढियां भी बीच-बीच में बनी हुई हैं। सीढियों की शुरुआत में ही इनकी संख्या भी लिखी रहती है। पुरे रास्ते में सुस्ताने के लिऐ टीनशेड और बेंच वगैरह की कोई कमी नहीं है। चायपान की स्टालों और शौचालयों की कोई गिनती ही नहीं है। रास्ते-भर माता के जयकारे उत्साह-वर्धन करते रहते हैं।

बाणगंगा से चलने के बाद पहला पङाव आता है- चरण-पादुका। यहां एक छो़टा सा मन्दिर बना हुआ है जिसमें एक शिला रखी हुई है। इस पर मानव पद-चिन्ह बने हुऐ हैं। बताया जाता है कि यह पद-चिन्ह मां वैष्णों देवी के हैं। बाणगंगा से चरण-पादुका की दुरी है- लगभग डेढ किलोमीटर।

अगला पङाव आता है- अर्धकुवांरी। इसे अधकुवांरी, अधकवांरी, आदिकुवांरी या अदकवारी भी कहते हैं। भवन तक की पैदल चढाई की यह मध्य-बिन्दु है। यहां करीब पंद्रह फीट लंबी एक गुफा है जिसे गर्भजुन कहा जाता है। बाणगंगा से अर्धकुवांरी की दुरी है- लगभग सात किलोमीटर। अर्धकुवांरी से भवन के लिऐ अब दो रास्ते हैं। एक परपंरागत रास्ता सांझी छत होते हुऐ औऱ एक नऐ वाला रास्ता हिमकोटि होते हुऐ। अधिकतर भक्तगण हिमकोटि के रास्ते का उपयोग करने लगे हैं। यह नया रास्ता कम चढाई भरा है और पाँच सौ मीटर छोटा भी है। इस रास्ते पर दिन के समय घाटी के बङे ही लुभावने दृश्य देखने को मिलते हैं। इस रास्ते पर घोङे और खच्चर चलने के अनुमति नहीं है। यह अनुमति न मिलने का कारण ही इस मखमली रास्ते में टाट का पैंबंद जैसा है। कारण यह है कि इस रास्ते पर भू-स्खलन हो जाते हैं।

यदि आप हिमकोटि वाले रास्ते का उपयोग करते हैं तो अन्य कोई पङाव आगे नहीं आता और फिर सीधे ही भवन पहुँच जाते हैं। सांझी छत वाला रास्ता कठिन चढाई वाला है। अर्धकुवांरी से सांझी छत की दुरी है लगभग साढे तीन किलोमीटर। सांझी छत में हेलीपैड भी है। बहुत से लोग सीधे कटरा से हेलिकॉप्टर में आते हैं और सांझी छत उतरते हैं। इनकी रिज़र्वेशन भी ऑनलाईन है पर आसानी से इच्छित समय पर हो नहीं पाती। एक-एक महीना अग्रिम बुकिंग चलती है। अब तो इन हेलिकॉप्टरों की व्यस्तता इतनी बढ गई है कि सारा दिन उपर-नीचे चक्कर लगाते ही रहते हैं। मैं कई बार वैष्णों देवी गया हुँ पर अपनी याद में केवल एक बार ही सांझी छत वाले मार्ग का उपयोग किया है।

जब हम भवन एरिया में पहुँचने को हुऐ तो एक बार फिर से एक चेक पोस्ट से गुजरना हुआ। तलाशी लेने के बाद हमें आगे जाने दिया गया। सुरक्षा के काफी सघन बंदोबस्त हैं भई यहां। भवन एरिया में काफी आगे जाने पर (लगभग अंत में) यात्रियों के नहाने धोने का प्रबंध है। पुरुषों के लिऐ अलग और महिलाओं के लिऐ अलग। पाईपों में टोंटियां लगाई गईं हैं जिनसे बर्फ से भी ठंडा पानी निकलता है। नहाते ही सारी थकान गायब। शायद ठंडे पानी से होने वाले सुन्नपने के कारण। फिर भी यह गंगोत्री में भागीरथी के पानी जितना ठंडा तो नहीं ही है। वहां तो पानी में एक गोता मारने के लिऐ भी शर्त लगानी पङ जाती है।

पवित्र गुफा में, जहां देवी पिंडी रुप में विराजमान हैं, कैमरा या मोबाईल या चमङे का कोई सामान ले जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है। इन सब सामानों को वैष्णों देवी श्राईन बोर्ड के लॉकरों में सुरक्षित रखा जा सकता है जो भवन एरिया में ही निःशुल्क उपलब्ध हैं। नहाने के बाद हमने भी अपना सामान इन लॉकरों में रख दिया। अब दर्शन करने के लिऐ लाईन में लगने ही जा रहे थे कि वो कुत्तों वाली घटना हो गई जिसका मैंनें पिछली पोस्ट में जिक्र किया था।

खैर आगे बढे और लाईन में लग गऐ। कोई अधिक लंबी लाईन नहीं मिली। जैसा कि मैंनें कामाख्या मंदिर वाली पोस्ट में बताया था कि धनवान भक्तों की कद्र अधिक होती है, वैसा ही यहां भी है। वैसे तो दर्शन निःशुल्क होते हैं पर कुछ धन खर्च करके आप विशेष पुजा करवा सकते हैं, विशेष आरती में शामिल हो सकते हैं और भी काफी कुछ विशेष कर सकते हैं। श्राईन बोर्ड का धन के प्रति ऐसा मोह देखकर श्रृद्धालुओं को निस्सदेंह झटका भी लगता होगा। भई मुझे तो लगता है। हां लोभ का जैसा नंगा नाच मैनें कामाख्या मंदिर में देखा था वैसा यहां कभी नहीं देखा। दर्शनार्थियों को लाईन में बनाऐ रखने के लिऐ लोहे की रेलिंग लगाई गई हैं। इन्हीं रेलिंग्स के बीच में चलना होता है। चलते-चलते एक बङे से हॉल में जा पहुँचते हैं। इससे निकलते ही एक और हॉल शुरु होता है। यह पहले वाले से थोङा छोटा है। श्रृद्धालुओं की श्रृद्धा को दुसरा झटका इसी हॉल में लगता है। यहां उनका सिर बेदर्दी से एक कोने में फेंक दिया जाता है, जहां और भी दुसरे ढेर सारे सिर पङे रहते हैं। घबराईये नहीं, आपको मारा नहीं जाऐगा। आपका सिर अपनी गर्दन से यथावत् चिपका हुआ, आपके धङ पर ही रखा रहेगा। लेकिन मैंनें ऐसा क्यूँ कहा, आपको जरा खोलकर बताता हुँ।
ध्यानू भगत का नाम आप सभी ने खुब सुना होगा। मुगल सम्राट अकबर के दबाव में आने पर उसे देवी भगवती की कठोर तपस्या करनी पङी थी। जी-तोङ कोशिश के बाद भी जब देवी प्रकट नहीं हुई तो उन्हें प्रसन्न करने के लिऐ ध्यानू भगत ने अपना सिर काटकर उन्हें भेंट करना चाहा। ध्यानू की ऐसी श्रृद्धा देखकर देवी तुरंत प्रकट हुई और ध्यानू भगत का सिर वापस उसके धङ से जोङ दिया। तत्पश्चात जब देवी ने ध्यानू को वर मांगने को कहा तो उसने परोपकार दिखाते हुऐ यही मांगा कि हे मां! मेरी तरह प्रत्येक भक्त आपको प्रसन्न करने के लिऐ अपना शीश भेंट नहीं कर सकता है। इसलिऐ आप केवल एक नारियल मात्र की भेंट से ही प्रसन्न होकर अपनी आशीर्वाद दे दिया करें। और उसे यह वरदान दे दिया गया।
तभी से भक्तगण माई के दर्शनों को जाते समय प्रसाद में नारियल अवश्य लेकर जाते हैं। अब लोग ध्यानू भगत की तरह बहादुर तो हैं नहीं और नारियल को ही शीश का रूपक मान कर श्री-चरणों में अर्पित करने पहुँच जाते हैं। परंतु अफसोस की हमारा शीश रूपी नारियल माता के दरबार यानि प्राचीन गुफा में पहुँच ही नहीं पाता और उपरोक्त हॉल में पहुँचते ही इसे एक ओर कोने में फेंक दिया जाता है। इसी लिऐ मैंने सिर के रूपक का उदाहरण दिया था। अब जो लोग दान-दक्षिणा और अन्य कर्मकांड में पुरा विश्वास करते हैं वे कृपया यह समझाऐं कि जब विधित भेंट माता के दरबार में पहुँची ही नहीं तो वह प्रसन्न कैसे हो जाऐगी। प्राचीन कथाऐं अपनी जगह हैं परंतु मेरे विचार से तो ईश्वर भेंट नहीं बंदे का भाव देखते हैं।

इस हॉल से निकलने के बाद हम पहुँचते हैं एक छोटी लेकिन बिल्कुल ही खुली जगह पर। यहां ठंडक थी। एक चीज और भी थी- शांति। आत्मा को भीतर तक संयमित कर देने वाली शांति। यद्यपि मानव ध्वनियां अब भी कानों तक पहुँच रही थीं पर जैसे दिमाग को किसी से कोई मतलब ही नहीं था। भई कसम से ऐसा पुरसुकून आनंद, ऐसी अलौकिक शांति जैसी वैष्णों देवी की गुफा के बाहर महसुस होती है संसार भर में शायद कहीं और महसुस नहीं हो सकती। मैं अतिश्योक्ति नहीं कर रहा। आप स्वयं जाऐं। महसुस कर के देखें।

ठीक सामने माता के ठिकाने का प्रवेश द्वार है। द्वार पर दो सिंहों की बङी मूर्तियां हैं। असल में यह एक सुरंग का द्वार है जिससे अंदर पहुँचा दर्शन करने पहुँचा जाता है। यह सुरंग नई बनी है, जिसमें आराम से खङे-खङे अंदर पहुँचा जा सकता है। प्राचीन गुफा को बंद कर दिया गया है, क्योंकि वह बेहद संकरी थी जिसे रेंग कर ही पार किया जा सकता था। हालांकि बताया जाता है कि कभी-कभी विशेष अवसरों पर इसे अब भी खोला जाता है। अंत में ये नई और पुरानी दोनों गुफाऐं अंदर एक ही जगह पर मिल जाती हैं। उसी स्थान पर तीन पाषाण-पिण्डीयां देवी सरस्वती, देवी काली और देवी लक्ष्मी के रुप में स्थापित हैं। आश्चर्य है कि जिस देवी के नाम पर यह तीर्थ स्थान विश्व भर में प्रसिद्ध है उसी मां वैष्णों देवी की पिण्डी यहां पर नहीं है। किवंदती है कि मां वैष्णों देवी यहां अदृश्य रुप से विद्यमान हैं और श्रीराम के वचनानुसार कलियुग में उनके कल्कि अवतार लेने की प्रतीक्षा कर रही हैं।

हम नई बनी गुफा से अंदर गऐ। जैसे ही हमारा नंबर आया, सब हाथ जोङकर जय माता दी करते हुऐ धोक लगाने लगे। लेकिन मेरी उद्यत नज़रें पिण्डीयों की टोह में थी। यहां इतना ताम-झाम है कि बगैर ध्यान से देखे आपको वो दिखेंगी ही नहीं औऱ फिर बाद में हाथ मलते रह जाऐंगें कि हमें तो पिण्डी-दर्शन हुऐ ही नहीं। फिर इस जगह ज्यादा खङे भी होने नहीं दिया जाता।

खैर दर्शन करने के बाद हम बाहर आऐ। भुख लगी थी सो एक रेस्टोरेंट में जा बैठे। कुछ रोटियां, नान और सब्जी ऑर्डर कर दिऐ गऐ। उपर भवन एरिया में खाना कुछ महंगा मिलता है। दाम के हिसाब का खाना भी नहीं है। कमरा लेकर रुकना तो और भी महंगा है। इन महंगे कमरों का भी पहले से आरक्षण कराना पङता है। खा-पीकर निकल आऐ। पिताजी पहले यहां हर वर्ष आते थे। अब उम्र बढने पर कुछ सालों से नहीं आ पाते हैं। सभी थक गऐ और भवन एरिया में ही रुकना चाह रहे थे। पर पिताजी का सुझाव था कि अभी भैंरो मंदिर चलते हैं। चढाई के लिऐ शरीर अनुकूल बना हुआ है। अगर अभी जा पहुँचे तो ठीक वरना सुबह बहुत मुश्किल हो जाऐगी। मेरे घर में पिता की इच्छा ही उनके हुक्म के समान है। उनके सुझाव को टालने का सवाल ही नहीं उठता था। एक के पीछे एक सभी चल पङे। यकीन मानिऐ इस केवल डेढ किलोमीटर की चढाई में हालत ये हो गई कि थकान के मारे सबके पैर कांपने लगे। मुश्किल से भैरों बाबा के दर्शन किऐ। भैंरो मंदिर के ठीक नीचे कुछ कमरे हैं। एक में कैंटीन जैसा कुछ इंतजाम है। बाकि दो-तीन आम जनता के रुकने के लिऐ हैं। रुकना बिल्कुल निःशुल्क है। फर्श पर ही लेटना पङता है, बिस्तर नहीं मिलता। बहुत बुरी कंडीशन में शौचालय भी हैं।

भैंरो मंदिर के इन्हीं कमरों में एक बार मेरा मौत से सामना हो चुका है। पर उसका वर्णन फिर कभी। अभी तो ये पोस्ट बहुत लंबी हो गई। बाकि अगले भाग में। चलिऐ अब फोटो देखते हैं।

Tawi River in Jammu
जम्मू में तवी नदी पर बना पुल

जम्मू-कटरा रोङ से त्रिकुटा पर्वत का नजारा

Katra
पैदल चढाई के वक्त- अग्रभूमि में मनीषा और पृष्ठभूमि में कटरा की रोशनियां

Vaisno Devi via Himkoti
बरास्ता-ए-हिमकोटि। पिताश्री, माताश्री, फक्कङ श्री और मनीषा

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