मंगलवार, 14 जुलाई 2015

शिमला यात्रा - दिल्ली से शिमला (प्रथम दिन)

हिमालय भारत का ताज है। ताज क्या राजा है राजा। जैसे राजाओं की कई-कई रानियां होती हैं, वैसे ही हिमालय के पहाङों की भी कई रानियां हैं। जैसे- मसूरी, शिमला आदि आदि आदि। तो जी 2012 के सितंबर माह में जब पहाङों की रानी शिमला का कार्यक्रम बन गया। सोचा वाहन भी कुछ राजसी झलक वाला होना चाहिऐ। अब मैं ठहरा बोद्दे हिसाब-किताब का माणस। जहाज में तो जा ना सकता। हिमालयन क्वीन का आरक्षण करा डाला। धुर शिमला तक कन्फर्म बर्थ भी मिल गई। हो गऐ शाही ठाठ। आराम से पैर पसार कर सफ़र करेंगें। ट्रेन का अंदाज़ राजसी ना सही, नाम तो है। अब महाराज हिमालय की रानी शिमला तक रानी ट्रेन से यात्रा करेंगें।


14095 हिमालयन क्वीन दिल्ली सराय रोहिल्ला (DEE) से सुबह साढे पाँच बजे नहा-धो के निकलती है और हरियाणा के कालका (KLK) में सवा ग्यारह पहुँचा देती है। इस गाङी में हमने अपनी सीट सोनीपत से कालका तक करवाई थी। 21 सितंबर 2012 की शाम को मैं और मनीषा अपनी मोटरसाईकिल लेकर सोनीपत जा पहुँचे। यहां मेरी ममेरी बहन रहती है। रात भर आराम से सोऐ और सुबह जीजा महाराज हमें गाङी से स्टेशन छोङ गऐ। वैसे तो टाईम था साढे छह साढे बजे का पर रानी जी आईं साढे सात बजे। पूरा एक घंटा लेट। भई अब हिमालयन क्वीन है तो अदाऐं और नख़रे तो लाजिमी हैं। खैर रानी-गाङी आईं और हमें गोद में उठा के चल दीं। अंदर स्पष्ट संकेत था कि उल्फ़त में उनकी रुसवा, इक हम ही नहीं तन्हा; गाङी में हम जैसे दीवाने हज़ारों हैं। भई भीङ थी ही इतनी कि उमराव जान फिल्म का ये गाना खुद ही याद हो आया। सुबह-सवेरे ढेर सारे हरियाणावी नौकरी पेशा लोग ट्रेन नहीं टाईम देखते हैं। इस बात से उन्हें कोई मतलब नहीं कि गाङी पैसेन्जर है या एक्सप्रेस। गाङी छोङिऐ डिब्बे से भी कोई मतलब नहीं। हां ऐ.सी. डिब्बे बख्श दिऐ जाते हैं। पर अपन को क्या? खुद हरियाणावी हुँ, जानता हुँ कैसे अक्खङता से बात करनी है। शिलांग यात्रा में इसका प्रमाण एक बार पहले भी आप लोगों को दिखाया था। फिर यहां तो अपनी सीट ही रिज़र्व है। फौरन जगह पकङ ली। खिङकी के पास मनीषा बैठ गई, फिर मैं और साथ में एक बुजुर्गवार। यह एक सेकेंड सीटिंग डिब्बा था। एक बुढी औरत काफी देर से परेशान हो रही थी। एडजस्ट करके उसे भी बिठाया। अंबाला तक इस रेलरुट पर मैं पहले भी बहुत बार यात्रा कर चुका हूँ सो अधिक रोमांचित नहीं था। हां कालका-शिमला की टॉय ट्रेन का रोमांच जरुर था। ब्रॉड गेज की गाङी के अलावा किसी दुसरी छोटी गेज की गाङी में पहली बार जो बैठने वाला था। गन्नौर-समालखा निकले पानीपत आया। बहुत से लोग उतरे, बहुत से चढे। सोनीपत-पानीपत जिलों में मेरा बचपन बीता है। कितनी ही यादें जुङी हैं सोनीपत और पानीपत के इलाके से। इन शहरों में आते ही एक अजीब अहसास, एक अजीब सी हिलोर उठने लगती है।

खैर आगे बढे। बीच-बीच में वेंडर भी आते रहे। ट्रेनों में कुछ ना कुछ सामान बेचने के लिऐ वेंडर आते ही रहते हैं। एक आया। अपने आप में सुपर बाजार। मोबाईल एक्ससेरीज, डायरी, पेन, कंघे और ना जाने किन-किन सामानों से लदा हुआ। छोटी मोटी लगभग हर एक जरुरत की चीज से लैस। मैंने दस रुपऐ में एक प्लास्टिक कार्ड वॉलेट ले लिया। अब मैं अपना लाइसेंस, आई-कार्ड, ए.टी.एम और दुसरे कार्ड एक जगह आराम से रख सकता था। फिर झङी लग गई उसके सामानों की बिक्री की। आज तीन साल भी वो वॉलेट अपना काम अच्छी तरह कर रहा है। दस रुपऐ से और कितनी उत्पादकता की उम्मीद की जा सकती है। लगभग साढे नौ बजे कुरुक्षेत्र पहुँचे। ट्रेन में भीङ भी कम हो रही थी और यह टाईम भी कवर कर रही थी। एक घंटा लेट से पौन घंटा लेट पर आ गई। कुरुक्षेत्र कौरवों और पांडवों के रणक्षेत्र के रुप में प्रसिद्ध है। लेकिन इसकी गाथा फिर कभी। कुरुक्षेत्र के बाद आता है शाहबाद और फिर अंबाला छावनी स्टेशन। यहां से आगे गाङी में भीङ नाम की कोई चीज नहीं थी। अंबाला छावनी अच्छा खासा जंक्शन भी है। रेल परिवहन का भी और सङक परिवहन का भी। यहां से दिल्ली, चंडीगढ, लुधियाना की ओर रेललाईनें जाती हैं। स्टेशन से बाहर निकलते ही राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक तो है ही। एक बढिया सङक पंचकूला की ओर भी जाती है जो हरियाणा का सबसे छोटा जिला है। पंचकूला तेजी से हरियाणा के सरकारी कार्यालयों का हब बनता जा रहा है।

अंबाला के बाद गाङी सीधे रुकी 56 किलोमीटर दुर चंडीगढ जाकर। इस स्वनामधन्य शहर का परिचय कराना ऐसा है जैसे सुरज को दीपक दिखाना। फिर भी जिन साहिबानों ने इसे नहीं देखा है, उन्हें यहां भी घुमाएंगें अवश्य। लेकिन अभी चलते हैं शिमला-दर्शन को। चंडीगढ-दर्शन फिर कभी। यहां से चलने के बाद एक स्टेशन आता है चंडी-मंदिर और फिर कालका। कालका अधिक उचांई पर तो नहीं है। यही कोई 700 मीटर के आस-पास है। फिर भी अंबाला के पास जो गर्मी महसूस होने लगी थी, तो कालका स्टेशन पर ठंडी बयार बह रही थी। जिस ट्रेन से हम आऐ उसमें शिमला के लिऐ कोई अधिक सवारियां नहीं थीं। अगर गर्मी की छुट्टियों के पीक सीजन में आते तो यहां भीङ का कोहराम मचा मिलता। लेकिन अब भीङ का नामोनिशान नहीं था। साढे ग्यारह बज रहे थे। टॉय-ट्रेन के चलने में वक्त था। कोल्ड-ड्रिंक और चिप्स ले कर एक बैंच पर बैठ गऐ। प्रेम वार्तालाप आंरभ हो गया। चिप्स निपटाते-निपटाते बारह बज गऐ। अपने बैग उठा कर गाङी में जा चढे। चढते ही गाङी समाप्त। किसी ट्रेन में इतनी थोङी सीटें पहले कभी नहीं देखीं। अरे! ये तो वाकई अपने नाम के अनुरुप ही है। टॉय-ट्रेन। छोटी सी गाङी, छोटे-छोटे डिब्बे। बिल्कुल खिलौनी सी। लेकिन साहब है बङी ढीठ। क्या छोटी सी गाङी है और क्या उंचे-उंचे पहाङों से टक्कर लेती है। सात सौ मीटर की उंचाई से चलती है और लगभग इक्कीस सौ मीटर पर जा चढती है। अपने तरह की एक ही है शायद में हिंदोस्तान में। दार्जिलिंग वाली तो मैंने देखी नहीं है। वो भी ऐसी ही है क्या? एक टॉय-ट्रेन और भी है हिमालय में- कांगङा रेल। पर कांगङा रेल शर्तिया ऐसी नही है। वो बेचारी पहाङ की उंचाई से बचती-बचती सी चलती है।

मैं कालका-शिमला टॉय-ट्रेन का ज्यादा बखान नहीं करुंगा क्योंकि यह जनरल नॉलेज की वेबसाईट नहीं है। अधिक ज्ञान बघार कर मैं बोरियत भी पैदा नहीं करना चाहता। यदि कभी ऐसा करना भी पङ जाता है तो बस इसलिऐ कि कभी-कभी किसी वृतांत से पहले भूमिका बांधनी जरुरी हो जाती है। कालका-शिमला टॉय-ट्रेन पुरी तरह से पहाङी रुट की गाङी है। 95 किलोमीटर के अपने सफ़र में लगभग 1400 मीटर यानि करीबन 4200 फीट की चढाई को पाँच घंटे से भी ज्यादा वक्त में पूरा करती है। यानि इसकी औसत रफ्तार है 20 किलोमीटर प्रतिघंटा से भी कम। नैरो गेज की पटरियां हैं जिनके बीच का फासला होता है मात्र ढाई फीट यानि 762 मिलीमीटर। सौ से भी अधिक सुरंगे और आठ सौ से भी अधिक पुल हैं। पुरा रास्ता बढिया प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलते हैं

कालका से निकलने के बाद पहला स्टेशन आया- टकसाल। नाम से लगता है कि कभी यहां पर सिक्को की ढलाई का काम होता होगा। हालांकि हकीकत क्या है, मुझे नहीं पता। इसके बाद स्टेशन आते रहे पर चूंकि हमने पैंसेजर का टिकट नहीं बनवाया था इसलिऐ गाङी बिना रुके चलती रही। इस रुट पर केवल एक गाङी नहीं है। पैंसेजर से फर्स्ट क्लास वातानुकूलित तक की गाङियां हैं। हैं सारी की सारी छोटी-छोटी टॉय-ट्रेन ही। हमारा पहला स्टॉप था- धर्मपुर हिमाचल। पाँच मिनट का ठहराव था। मैं उतरा और फोटो खींचकर वापस जा चढा। इसके बाद आया- कुमारहट्टी दगसाई और फिर बङोग। किसी ने बताया कि इसका नाम किसी अंग्रेज इंजीनियर कर्नल बङोग के नाम पर पङा है। बङोग में ही इस रुट की सबसे लंबी सुरंग है। कहते हैं कि कर्नल बङोग ने इस सुरंग को बनवाना आरंभ किया था। उसने पहाङ को दोनों तरफ से काटकर इसका निर्माण शुरु किया था पर ये दोनों सिरे आपस में मिल नहीं पाऐ। दो तरफ से खुदाई के कारण कुछ फर्क रह गया। दंडस्वरुप अंग्रेज इंजीनियर पर एक रुपऐ का जुर्माना लगाया गया। कर्नल बङोग ने इसे अपनी जलालत समझी और उसी अधुरी बनी सुरंग में आत्महत्या कर ली।

फिर और भी कई जगह गाङी रुकती गई और चलती रही जैसे- सोलन, कंडाघाट, तारा देवी, जटोग आदि। करीब छह बजे शिमला पहुँचे। पका दिऐ यार इस रेलगाङी नै तो। सच में। मजाक नहीं कर रहा हुँ। शुरु-शुरु में तो बङा मजा आया। धीमी चाल से चलती हुई ट्रेन से पहाङी नजारों का अलग ही मजा आ रहा था। ऐसे बहुत से नजारे देखने को मिलते हैं जिन्हें आप जिंदगी भर भुल नहीं पाऐंगें। पर सोलन के बाद यह मजा बोरियत में बदलने लगा। ट्रेन इतनी मंद गति से चल रही थी कि लगता था जैसे मंजिल पे पहुँचाऐगी ही नहीं। धीरे-धीरे बोरियत भी बेचैनी में बदलने लगी। उपर से धुऐं के गुब्बार। जब भी कोई सुरंग आती इंजन का सारा धुंआ डिब्बे के अंदर भर जाता। सबसे ज्यादा परेशान तो इस धुऐं के कारण ही हुऐ। सोलन से नीचे गरमी भी बहुत लगती है। अगर आपका कभी कालका-शिमला टॉय-ट्रेन का कार्यक्रम बने तो मैं ए.सी. डिब्बे में रिजर्वेशन की सलाह दूंगा। इनमें गरमी नहीं सताती और शीशे बंद रहने के कारण धुंआ भी अंदर नहीं घुसता।

शिमला पहुँचने के बाद पहली समस्या थी अच्छा सा ठिकाना ढुंढने की। किसी शहर में पहली दफा जाने पर ऐसी समस्या तो लाजिमी ही है। खासतौर पर यदि आप मेरे जैसे फक्कङ घुमक्कङ हों। फिर शिमला जैसी मंहगी जगहों पर कम दामों में बढिया जगह ढुंढ लेना आसान भी नहीं है। स्टेशन से निकलते ही होटलों के कमीशनखोर एजेंट गले पङ गऐ। इन पर ध्यान नहीं दिया। किसी से मॉल रोड पुछा और आगे बढ चले। पर एजेंट भी कहां हार मानने वाले थे। पीछे-पीछे हो लिऐ। इन्हें देख कर वैष्णों देवी यात्रा की याद आ गई। कटरा में भी होटलों के एजेंट ऐसे ही हमारे पीछे पङे रहे थे। यहां भी एक पठ्ठा करीब एक किलोमीटर तक तरह तरह के प्रलोभन देता ही रहा। जब हमने उसकी बिल्कुल भी नहीं सुनी तो वो बेचारा जान गया कि यहां दाल नहीं गलने वाली और वो लौट गया। मॉल रोड पूछते-पूछते करीब दो किलोमीटर पैदल निकल आऐ पर अपने हिसाब का कोई ठिकाना ही नहीं दिखा। ना ही मॉल रोड की कोई झलक दिखाई पङी। आखिर में पूछना छोङ कर एक चढाई वाली सङक पर चलना शुरु कर दिया। मोङों पर घुमते हुऐ अब होटल भी दिखने बंद हो गऐ। उपर से अंधेरा होना शुरु हो गया। यार बुरे फंसे। अब क्या करें। वापस जाऐं कि और आगे बढें। अब इस परेशान कर देने वाली घङी में मैं और मनीषा सलाह-मशविरा कर ही रहे थे कि दो फौजी पास से गुजरे। शिमला में सेना का भी ठिकाना है ना। उनकी शक्लों से मुझे ऐसा लगा कि वे हरियाणा से थे। जब वे पास से गुजर रहे थे तो अपनी देसी हरियाणावी बोली मैंने धीमे से कहा- आच्छे फंस्से भई। कङै के शिमला घुम्मांगें। आङै तौ रुक्कण का ऐ ठिकाणा ना मिलदा। अरै फौजीऔ थामै किमै मदद कर दो। हालांकि मैं लगभग फुसफुसाया ही था पर उन्होंने सुन लिया। वे मुङे और हमारे पास आऐ। पुछा- के हौया भाई। के बात सै। मैं खुश हो गया कि बंदे हरियाणा से ही हैं और हमारी सहायता भी जरुर करेंगें। मैंने उन्हें अपनी समस्या बता दी कि भई पहली बार शिमला घुमने आया हुँ। रात हो रही है और कोई सस्ता कमरा मिल नहीं रहा। तुम्हारी भाभी भी साथ में है। तुम यहां रहते हो तो कोई कमरा ही दिलवा दो। उनमें से एक कहने लगा कि भाई हमें ड्यूटी के लिऐ देर हो रही है, नहीं तो जरुर मदद करते। पर दुसरे ने कहा कि अब ये भी हमारी ड्यूटी ही हैं। तु चल मैं अभी इन्हें कमरा दिलवा कर आता हुँ। वो एक रास्ते पर करीब सौ मीटर तिरछा घुमा कर ले गया। पीछे-पीछे दुसरा फौजी भी आ गया। होटल गुलमर्ग रिजेंसी के सामने जा कर रुक गऐ। होटल का ढीम-ढांचा देखते ही मन में आया कि जेब पर डाका पङने वाला है। काफी मंहगा होटल लग रहा था। रेट-लिस्ट लगी हुई थी। 2000 से नीचे एक भी कमरा नहीं था। मैंने कहा कि फौजी भाई मुझे इतना मंहगे होटल का कमरा नहीं चाहिऐ। पर उसने चुप रहने का इशारा कर दिया। कहा कि मैं सिर्फ देखता रहूं, बोलूं कुछ नहीं। क्या करता। राम का नाम लिया और चुपचाप खङा हो गया। जो होगा देखा जाऐगा। फौजी ने काउंटर वाले से कहा कि ये बंदा (यानि मैं) उसकी बुआ का लङका है और फलां वाला कमरा दे दिया जाऐ। मुझे एक लङके के साथ कमरा देखने के लिऐ भेज दिया गया। गया। देखा। क्या कमरा था? दीवारों पर चारों ओर शीशे ही शीशे। कलर टी.वी.। टेलिफोन। शॉवर और गीज़र युक्त साफ सुथरा अटैच लेट्रिन-बाथरुम। सारी सुविधाऐं। काउंटर पर वापस आया तो फौजी भाई ने पुछा कि कैसा लगा कमरा। मैंने कहा कि कमरा तो खूब बढिया पर इसके रेट? तो उसने कहा कि वो चिंता तुम मत करो। और आश्चर्यचनक रुप से उसने दो हजार रुपऐ वाला कमरा मात्र पाँच सौ रुपऐ में दिलवा दिया। होटलों में प्रायः शुरु में पैसे ले लिऐ जाते हैं और फिर बाद में किसी वजह से आप यदि छोङना भी चाहें तो रिफंड में काफी दिक्कत आती है। ऐसे में आपको तय अवधि तक उसी होटल में रुकना ही पङता है। पर यहां फौजी ने कहलवा दिया कि पैसे सवेरे दे देना, अभी देने की जरुरत नहीं है। मान गऐ भई। परदेस में भी अपने देसी भाई ने बढिया मदद करी। और फिर साधुवाद देकर उन्हें विदा किया।

फिर हम अपने कमरे में आ गऐ। देखकर श्रीमतिजी भी खुश हो गईं। अब नहा-धोकर तरोताजा हुऐ और खाना बाहर से ले आऐ। खा-पीकर सो गऐ।

Chandigarh Railway Station
चंडीगढ-आगमन

Kalka Shimla Toy Train Route
कालका-शिमला टॉय-ट्रेन रुट

Kalka Shimla Toy Train
धर्मपुर हिमाचल स्टेशन

Kalka Shimla Toy Train
तारा देवी स्टेशन

Hotel Room in Shimla
शिमला में फौजी भाई द्वारा दिलवाया गया कमरा

Hotel in Shimla
होटल की एक गैलरी

Good Hotel in Shimla
इसी होटल में कमरा लिया था।

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